Wednesday, March 21, 2012

छूट गया है

छूट गया है
मन की मूरत तुम्हे बना कर
रखा हुआ था मन में
रग रग में थे, तन में थे
तुम ही तुम थे जीवन में
उस मन की मूरत का
हर इक पत्थर टूट गया है
जाने क्यों लग रहा है
की अब वो सब छूट गया है

जिसे बना कर रखा था साथी
हमने हर इक पल का
जो था साथी अपने बीते
हर इक स्वर्णिम का
जिसे मनाया मुश्किओल से था
वो ही रूठ गया है
जाने क्यों लग रहा है
की अब वो सब छूट गया है

मन को मेरे इतना टटोला
फिर से आओ टटोलो
कुछ न बोला
चले गए क्यों
अब कुछ आओ बोलो
हृदय के द्वार जो खुली हवा से
फिर आ कर खोलो
किस्मत का जो बड़ा घड़ा था
कैसे फूट गया है

जाने क्यों लग रहा है
की अब वो सब छूट गया है

-जितेश मेहता

Tuesday, March 20, 2012

ये मन अक्सर न जाने क्यूँ

ये मन अक्सर न जाने क्यूँ
युहीं विचलित सा रहता है

कभी लगता है
खुशियों के सभी रस्ते बंद से हैं
तरक्की की गलियों के किनारे भी तंग से हैं
कभी कहता है आगे बढ़
कभी रुक जा ये कहता है

ये मन अक्सर न जाने क्यूँ
युहीं विचलित सा रहता है

कभी सब छूट जायेगा अचानक
डर सताता है
न समझे लेके आया था कुछ न
कुछ लेके जाता है
यही विचार कितनी बार मस्तिष्क सहता है

ये मन अक्सर न जाने क्यूँ
युहीं विचलित सा रहता है

सभी मुझको बड़ा परेशान
हो हैरान कहते हैं
ख़ुशी से जी ये है जीवन बड़ा
आसान कहते हैं
ये मन फिर भी रुके न
भावना की धारा में बहता है

ये मन अक्सर न जाने क्यूँ
युहीं विचलित सा रहता है

-जितेश मेहता