Friday, July 23, 2010

छूट गया है

छूट गया है 

मन की मूरत तुम्हे बना कर
रखा हुआ था मन में
रग  रग में थे, तन में थे
तुम ही तुम थे जीवन में
उस मन की मूरत का
हर इक पत्थर टूट गया है
जाने क्यों लग रहा है
की  अब वो सब छूट गया है

जिसे बना कर रखा था साथी
हमने हर इक पल का
जो था साथी अपने बीते
हर इक स्वर्णिम का
जिसे मनाया मुश्किओल से था
वो ही रूठ गया है
जाने क्यों लग रहा है
की  अब वो सब छूट गया है

मन  को मेरे इतना टटोला
फिर से आओ टटोलो
कुछ न बोला
चले गए क्यों
अब कुछ आओ बोलो
हृदय के द्वार जो खुली हवा से
फिर आ कर खोलो
किस्मत का जो बड़ा घड़ा था
कैसे फूट गया है

जाने क्यों लग रहा है
की  अब वो सब छूट गया है

-जितेश मेहता
टिम लक लक

रात आती है तो नींद कहीं
चली  जाती है
सप्न्नों की रोज़ इक गली जाती है
होता है अच्चाम्भा जब खोलों मैं पलक
टिम लक लक ते टिम लक लक

रहता  हूँ में सब के करीब हर दम
बातों में हूँ सब से गरीब हर दम
बोलता हूँ जैसे जीभ जाती है अटक
टिम लक लक ते टिम लक लक

दिल की मैं बात नहीं रखूँ दिल में
गलत हूँ बोल देता महफ़िल में
कभी कभी खाता मुह की धूबी पटक
टिम लक लक ते टिम लक लक

पर दोस्तों का दोस्त पीछे नहीं  हटता
गैर्रों  की बातों से मैं हूँ नहीं पटता 
मुश्किलों  मैं कभी नहीं झपकूं पलक
टिम लक लक ते टिम लक लक

सपनों का महल रोज़ हूँ मैं बुनता
दिल जो कहे हूँ बस वही सुनता
जाना दूर जहाँ तक जाए फलक
टिम लक लक ते टिम लक लक

-जितेश मेहता

life में

life में 

खुश तू आज कॉलेज में इस लड़की के साथ
जीना चाहता है जीवन डाले हाथों में हाथ
पर  आगे जीवन के मोड़ बहुत हैं
ये कड़ी कहीं न कहीं टूट जायेगी
किस्मत तेरी बदलेगी
पर अभी के हिसाब से तेरी किस्मत फूट जायेगी

इक और लड़की मिलेगी ऑफिस में कहीं
जो तुझे दिल दे बैठेगी
फिर तन, धन और अपनापन दे बैठेगी
पर जात, पात और परिवार की कड़ीयों में
ये कड़ी कहीं न कहीं टूट जायेगी
किस्मत तेरी बद्केगी
पर अभी के हिसाब से तेरी किस्मत फूट जायेगी

इक  और ऑफिस इक और लड़की
पर इस बार सब ठीक होगा
जात, पात , परिवार सब मिलता है
अब  शादी कर ही लो, चलता है


कुछ साल बाद कॉलेज वाली और ऑफिस वाली
दोनों बहुत याद आएँगी
पर शादी वाली लड़की से छुटकारा नहीं
तुझसे जादा इस के लिए और कोई प्यारा नहीं
इस बात की गाँठ बाँध ले अपनी life में
इक दिन तू भी ढूंढ लेगा अपनी गर्ल फ्रेंड
अपनी ही wife में

इक दिन

इक दिन

जवानी खूब है उठता सैलाब सा
सब खुला है मनचला
खुली एक किताब सा
सब बंद होने लगेगा
जब तू उम्र की राह में आगे बढेगा
इक दिन

फिर शादी होगी
कुछ साल बीतेंगे खिलखिलाते
दिन रात के इंतज़ार में बीतेंगे
रातें  बीतेंगी जागते जागते
रफ़्तार अच्चानक धीरे होने लगेगी
इन भागते दिनों की
इक दिन

फिर  बच्चे होंगे
पहले कच कच करते कच्चे
बाद में शैतान, समझदार या अच्छे होंगे
परेशानियों का बदल छाने की कोहिश करेगा
आखिर  तुने किया है
तू ही भरेगा
इक दिन

फिर चलने पर,उठने पर, बैठने पर
हड्डियों की आवाज़ कान में
गूंजने लगेगी
रातें अब भी आखें खोले ही जागेंगी 
पर अहसास जवानी से कुछ अलग होगा
क्यूंकि परेशानियों के बदल से दर्द की बूँदें बरसने लगेंगी
इक दिन

-जितेश  मेहता