Friday, July 23, 2010

टिम लक लक

रात आती है तो नींद कहीं
चली  जाती है
सप्न्नों की रोज़ इक गली जाती है
होता है अच्चाम्भा जब खोलों मैं पलक
टिम लक लक ते टिम लक लक

रहता  हूँ में सब के करीब हर दम
बातों में हूँ सब से गरीब हर दम
बोलता हूँ जैसे जीभ जाती है अटक
टिम लक लक ते टिम लक लक

दिल की मैं बात नहीं रखूँ दिल में
गलत हूँ बोल देता महफ़िल में
कभी कभी खाता मुह की धूबी पटक
टिम लक लक ते टिम लक लक

पर दोस्तों का दोस्त पीछे नहीं  हटता
गैर्रों  की बातों से मैं हूँ नहीं पटता 
मुश्किलों  मैं कभी नहीं झपकूं पलक
टिम लक लक ते टिम लक लक

सपनों का महल रोज़ हूँ मैं बुनता
दिल जो कहे हूँ बस वही सुनता
जाना दूर जहाँ तक जाए फलक
टिम लक लक ते टिम लक लक

-जितेश मेहता

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