टिम लक लक
रात आती है तो नींद कहीं
चली जाती है
सप्न्नों की रोज़ इक गली जाती है
होता है अच्चाम्भा जब खोलों मैं पलक
टिम लक लक ते टिम लक लक
रहता हूँ में सब के करीब हर दम
बातों में हूँ सब से गरीब हर दम
बोलता हूँ जैसे जीभ जाती है अटक
टिम लक लक ते टिम लक लक
दिल की मैं बात नहीं रखूँ दिल में
गलत हूँ बोल देता महफ़िल में
कभी कभी खाता मुह की धूबी पटक
टिम लक लक ते टिम लक लक
पर दोस्तों का दोस्त पीछे नहीं हटता
गैर्रों की बातों से मैं हूँ नहीं पटता
मुश्किलों मैं कभी नहीं झपकूं पलक
टिम लक लक ते टिम लक लक
सपनों का महल रोज़ हूँ मैं बुनता
दिल जो कहे हूँ बस वही सुनता
जाना दूर जहाँ तक जाए फलक
टिम लक लक ते टिम लक लक
-जितेश मेहता
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