Friday, July 23, 2010

छूट गया है

छूट गया है 

मन की मूरत तुम्हे बना कर
रखा हुआ था मन में
रग  रग में थे, तन में थे
तुम ही तुम थे जीवन में
उस मन की मूरत का
हर इक पत्थर टूट गया है
जाने क्यों लग रहा है
की  अब वो सब छूट गया है

जिसे बना कर रखा था साथी
हमने हर इक पल का
जो था साथी अपने बीते
हर इक स्वर्णिम का
जिसे मनाया मुश्किओल से था
वो ही रूठ गया है
जाने क्यों लग रहा है
की  अब वो सब छूट गया है

मन  को मेरे इतना टटोला
फिर से आओ टटोलो
कुछ न बोला
चले गए क्यों
अब कुछ आओ बोलो
हृदय के द्वार जो खुली हवा से
फिर आ कर खोलो
किस्मत का जो बड़ा घड़ा था
कैसे फूट गया है

जाने क्यों लग रहा है
की  अब वो सब छूट गया है

-जितेश मेहता

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