Friday, July 23, 2010

इक दिन

इक दिन

जवानी खूब है उठता सैलाब सा
सब खुला है मनचला
खुली एक किताब सा
सब बंद होने लगेगा
जब तू उम्र की राह में आगे बढेगा
इक दिन

फिर शादी होगी
कुछ साल बीतेंगे खिलखिलाते
दिन रात के इंतज़ार में बीतेंगे
रातें  बीतेंगी जागते जागते
रफ़्तार अच्चानक धीरे होने लगेगी
इन भागते दिनों की
इक दिन

फिर  बच्चे होंगे
पहले कच कच करते कच्चे
बाद में शैतान, समझदार या अच्छे होंगे
परेशानियों का बदल छाने की कोहिश करेगा
आखिर  तुने किया है
तू ही भरेगा
इक दिन

फिर चलने पर,उठने पर, बैठने पर
हड्डियों की आवाज़ कान में
गूंजने लगेगी
रातें अब भी आखें खोले ही जागेंगी 
पर अहसास जवानी से कुछ अलग होगा
क्यूंकि परेशानियों के बदल से दर्द की बूँदें बरसने लगेंगी
इक दिन

-जितेश  मेहता

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