Friday, October 22, 2010

Risk is Return

अगर risk  नहीं तो return नहीं
आने वाली तेरी कभी turn नहीं
नहीं achieve कर पायेगा जो चाहता है
अगर खुद को करेगा तू burn नहीं
अगर risk नहीं तो return नहीं
कर पायेगा कुछ earn नहीं
अगर करेगा कुछ अर्पण नहीं
सब्र तो रखना होगा
कठिनाइयों को चखना होगा
वर्ना तरक्की का कभी देखेगा दर्पण नहीं
अगर risk नहीं तो return नहीं
सफल हो पायेगा जीवन नहीं
गुम हो जायेगा लोगों में कहीं
जो है आज है अभी है
अगर कर पाया इस बात से concern नहीं
अगर risk नहीं तो return नहीं

- जितेश मेहता

 









Thursday, August 26, 2010

to my Better Half

मैं अपनी बीवी से दूर हूँ
अकेला उदास मजबूर हूँ
सज़ा पा रहा हूँ अकेले
इस सावन में रहने की
लेकिन मैं बिलकुल बेक़सूर हूँ

कब न जाने फिर मिलना होगा
उस हूर से
कब तक निहारूंगा उसे
इतनी दूर से
पर जीवन में ये सब करना पड़ता है
जानता मैं ज़रूर हूँ
मैं अपनी बीवी से दूर हूँ

अकेला उदास मजबूर हूँ
सज़ा पा रहा हूँ अकेले
इस सावन में रहने की
लेकिन मैं बिलकुल बेक़सूर हूँ

जितेश - वसुंधरा सिर्फ तुम्हारा

Friday, July 23, 2010

छूट गया है

छूट गया है 

मन की मूरत तुम्हे बना कर
रखा हुआ था मन में
रग  रग में थे, तन में थे
तुम ही तुम थे जीवन में
उस मन की मूरत का
हर इक पत्थर टूट गया है
जाने क्यों लग रहा है
की  अब वो सब छूट गया है

जिसे बना कर रखा था साथी
हमने हर इक पल का
जो था साथी अपने बीते
हर इक स्वर्णिम का
जिसे मनाया मुश्किओल से था
वो ही रूठ गया है
जाने क्यों लग रहा है
की  अब वो सब छूट गया है

मन  को मेरे इतना टटोला
फिर से आओ टटोलो
कुछ न बोला
चले गए क्यों
अब कुछ आओ बोलो
हृदय के द्वार जो खुली हवा से
फिर आ कर खोलो
किस्मत का जो बड़ा घड़ा था
कैसे फूट गया है

जाने क्यों लग रहा है
की  अब वो सब छूट गया है

-जितेश मेहता
टिम लक लक

रात आती है तो नींद कहीं
चली  जाती है
सप्न्नों की रोज़ इक गली जाती है
होता है अच्चाम्भा जब खोलों मैं पलक
टिम लक लक ते टिम लक लक

रहता  हूँ में सब के करीब हर दम
बातों में हूँ सब से गरीब हर दम
बोलता हूँ जैसे जीभ जाती है अटक
टिम लक लक ते टिम लक लक

दिल की मैं बात नहीं रखूँ दिल में
गलत हूँ बोल देता महफ़िल में
कभी कभी खाता मुह की धूबी पटक
टिम लक लक ते टिम लक लक

पर दोस्तों का दोस्त पीछे नहीं  हटता
गैर्रों  की बातों से मैं हूँ नहीं पटता 
मुश्किलों  मैं कभी नहीं झपकूं पलक
टिम लक लक ते टिम लक लक

सपनों का महल रोज़ हूँ मैं बुनता
दिल जो कहे हूँ बस वही सुनता
जाना दूर जहाँ तक जाए फलक
टिम लक लक ते टिम लक लक

-जितेश मेहता

life में

life में 

खुश तू आज कॉलेज में इस लड़की के साथ
जीना चाहता है जीवन डाले हाथों में हाथ
पर  आगे जीवन के मोड़ बहुत हैं
ये कड़ी कहीं न कहीं टूट जायेगी
किस्मत तेरी बदलेगी
पर अभी के हिसाब से तेरी किस्मत फूट जायेगी

इक और लड़की मिलेगी ऑफिस में कहीं
जो तुझे दिल दे बैठेगी
फिर तन, धन और अपनापन दे बैठेगी
पर जात, पात और परिवार की कड़ीयों में
ये कड़ी कहीं न कहीं टूट जायेगी
किस्मत तेरी बद्केगी
पर अभी के हिसाब से तेरी किस्मत फूट जायेगी

इक  और ऑफिस इक और लड़की
पर इस बार सब ठीक होगा
जात, पात , परिवार सब मिलता है
अब  शादी कर ही लो, चलता है


कुछ साल बाद कॉलेज वाली और ऑफिस वाली
दोनों बहुत याद आएँगी
पर शादी वाली लड़की से छुटकारा नहीं
तुझसे जादा इस के लिए और कोई प्यारा नहीं
इस बात की गाँठ बाँध ले अपनी life में
इक दिन तू भी ढूंढ लेगा अपनी गर्ल फ्रेंड
अपनी ही wife में

इक दिन

इक दिन

जवानी खूब है उठता सैलाब सा
सब खुला है मनचला
खुली एक किताब सा
सब बंद होने लगेगा
जब तू उम्र की राह में आगे बढेगा
इक दिन

फिर शादी होगी
कुछ साल बीतेंगे खिलखिलाते
दिन रात के इंतज़ार में बीतेंगे
रातें  बीतेंगी जागते जागते
रफ़्तार अच्चानक धीरे होने लगेगी
इन भागते दिनों की
इक दिन

फिर  बच्चे होंगे
पहले कच कच करते कच्चे
बाद में शैतान, समझदार या अच्छे होंगे
परेशानियों का बदल छाने की कोहिश करेगा
आखिर  तुने किया है
तू ही भरेगा
इक दिन

फिर चलने पर,उठने पर, बैठने पर
हड्डियों की आवाज़ कान में
गूंजने लगेगी
रातें अब भी आखें खोले ही जागेंगी 
पर अहसास जवानी से कुछ अलग होगा
क्यूंकि परेशानियों के बदल से दर्द की बूँदें बरसने लगेंगी
इक दिन

-जितेश  मेहता

Monday, June 21, 2010

वो लड़की

आज मैं जिससे मिला वो लड़की दिखने में dusky थी
आवाज़ जो दिल को छू गयी आवाज़ उसकी husky थी
(आज मैं जिससे मिला उस लड़की का रंग गेहूँआ  था
आवाज़ में वो गहराई थी जैसे गहरा भरा कोई कुआँ था)
बाल थे जैसे काली रात के बादलों का झुण्ड
जुबां से गिरते शब्द जैसे अमृत का कुंड
उसकी आँखें कंचे जिसमे दुनिया पूरी समाई
हिलती काली पुतली उसमे जिसमे गंगा सी गहराई
उसके दांत संगे मर-मर चमके तर्रों से चम चम
हर सांस में इतनी खुशबू जीवन को महका दे हर दम
अब न जाने दिल उसको क्यों भूल नहीं पाता है
अन्दर कुछ कुछ कुछ कुछ होता है
बस ध्यान उसी तरफ जाता है

- जितेश मेहता

Monday, June 14, 2010

Divorce / Talaak ek saza

तलाक तो दे रहे हो मुझे गुरुर और  कहर  के साथ
मेरा जवानी भी लौटा दो मेरी मेहर के साथ

दिन लिए, महीने लिए, साल लिए
मेरी शाम भी वापस दे दो मेरी सहर के साथ

अब तिल तिल के जीने से क्या फायदा
साँसे मेरी लौटा दो एक बोतल ज़हर के साथ

तुम्हारा प्यार था मेरे जीवन की बारिश
अब खत्म हो गयीं सारी ख्वाहिश
अब ले गए हो अपनेपन की धुप
मोहब्बत की दोपहर के साथ

तुम्हारे कहते ही कि मैं तुम संग जी न सकूँगा
अब साथ चलोगी तो और थकुंगा
मेरे सपने बह गए जैसे कहीं 
बदनसीबी की नेहर के साथ

तलाक तो दे रहे हो मुझे गुरुर और कहर के साथ

मेरा जवानी भी लौटा दो मेरी मेहर के साथ

-जितेश मेहता

 

Wednesday, June 9, 2010

मज़ेदार ज़िंदगी




बेकार ज़िंदगी खुद्दार ज़िंदगी
फिर भी ना जाने क्यों है मज़ेदार ज़िंदगी

चलती है कभी रो रो के चींटी की चाल
कभी भागे तेज़ हवा सी कमाल
मद्धम कभी है
कभी धुवा धार ज़िंदगी


बेकार ज़िंदगी खुद्दार ज़िंदगी
फिर भी ना जाने क्यों है मज़ेदार ज़िंदगी


चारों तरफ था छाया
बस तुम्हारा ही खुमार
कल भी था और आज भी तुम्हारा इंतेज़ार
तुम थे तो खुशियों से थी बेशुमार ज़िंदगी






बेकार ज़िंदगी खुद्दार ज़िंदगी
फिर भी ना जाने क्यों है मज़ेदार ज़िंदगी






कभी थी खुशियाँ
अब है चारों तरफ छाया गम
जो था कभी
नही अब रहा है वही दम
मजबूरों की बनी इक कतार ज़िंदगी






बेकार ज़िंदगी खुद्दार ज़िंदगी
फिर भी ना जाने क्यों है मज़ेदार ज़िंदगी

-जितेश मेहता

सर ख़रोची की तम्मना

सर ख़रोची की तमन्ना अब हमारे जी में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कैंची में है

आज बतला देंगे sabko himmate marda hain hum 
बाल सर पे जादा हैं to katwaane mein kya sharam
बाल कटवाते ही मज़ा आये है जो AC में है
सर ख़रोची की तमन्ना अब हमारे जी में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कैंची में है

barber बाल काटे कम, है बोले पर बड़ा
फूटता है मोहल्ले के हर issue का उसके यहाँ घड़ा 
बक बक है करता जैसे न्यूज़ किसी TV में है
सर ख़रोची की तमन्ना अब हमारे जी में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कैंची में है


baal lambe rakhna humko bhi hai man par kya kahun 
poora saal garmiyon mein in sang kaise rahun 
lambe baalon ka maza to mausamein sardi mein hai 

सर ख़रोची की तमन्ना अब हमारे जी में है 
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कैंची में है

जितेश मेहता