ज़बान संभाल के
ये शब्दों के खेल भी निराला है
किसी को राजा से रंक किसी रंक से राजा बना डाला है
वो जीत जाता हैं जो समझ जाता है रस्ते इन शब्दों के जाल के
तभी हैं कहते जब भी बोलो, बोलो ज़बान संभाल के
जीवन की समस्याएं और उनका भोज तो सब पर एक सा है
कोई इनसे डर कर मुजरिम बनता कोई रह जाता नेक सा है
हर शब्द जो मुह से निकले है बतलाता है दिल-इ-हाल के
तभी हैं कहते जब भी बोलो, बोलो ज़बान संभाल के
इतिहास गवाह है जो भी हुआ है किसी के शब्दों का परिणाम है
जो समझ गया कब क्या कहना उसका ही ऊँचा नाम है
हर शब्द ये निश्चित करता है कौन नेता हैं किस काल के
तभी हैं कहते जब भी बोलो, बोलो ज़बान संभाल के
-जितेश मेहता

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