Sunday, April 24, 2011

ज़बान संभाल के

ज़बान संभाल के 

ये शब्दों के खेल भी निराला है
किसी को राजा से रंक किसी रंक से राजा बना डाला है 
वो जीत जाता हैं जो समझ जाता है रस्ते इन शब्दों के जाल के
तभी हैं कहते जब भी बोलो, बोलो ज़बान संभाल के 

जीवन की समस्याएं और उनका भोज तो सब पर एक सा है 
कोई इनसे डर कर मुजरिम बनता कोई रह जाता नेक सा है 
हर शब्द जो मुह से निकले है बतलाता है दिल-इ-हाल के 
तभी हैं कहते जब भी बोलो, बोलो ज़बान संभाल के 

इतिहास गवाह है जो भी हुआ है किसी के शब्दों का परिणाम है 
जो समझ गया कब क्या कहना उसका ही ऊँचा नाम है 
हर शब्द ये निश्चित करता है कौन नेता हैं किस काल के
तभी हैं कहते जब भी बोलो, बोलो ज़बान संभाल के  

-जितेश मेहता 

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