Wednesday, June 9, 2010
मज़ेदार ज़िंदगी
बेकार ज़िंदगी खुद्दार ज़िंदगी
फिर भी ना जाने क्यों है मज़ेदार ज़िंदगी
चलती है कभी रो रो के चींटी की चाल
कभी भागे तेज़ हवा सी कमाल
मद्धम कभी है
कभी धुवा धार ज़िंदगी
बेकार ज़िंदगी खुद्दार ज़िंदगी
फिर भी ना जाने क्यों है मज़ेदार ज़िंदगी
चारों तरफ था छाया
बस तुम्हारा ही खुमार
कल भी था और आज भी तुम्हारा इंतेज़ार
तुम थे तो खुशियों से थी बेशुमार ज़िंदगी
बेकार ज़िंदगी खुद्दार ज़िंदगी
फिर भी ना जाने क्यों है मज़ेदार ज़िंदगी
कभी थी खुशियाँ
अब है चारों तरफ छाया गम
जो था कभी
नही अब रहा है वही दम
मजबूरों की बनी इक कतार ज़िंदगी
बेकार ज़िंदगी खुद्दार ज़िंदगी
फिर भी ना जाने क्यों है मज़ेदार ज़िंदगी
-जितेश मेहता
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